Couplets Poetry (page 512)
था व'अदा शाम का मगर आए वो रात को
अनवर शऊर
तेरी आस पे जीता था मैं वो भी ख़त्म हुई
अनवर शऊर
तिरे होते जो जचती ही नहीं थी
अनवर शऊर
सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं
अनवर शऊर
'शुऊर' तुम ने ख़ुदा जाने क्या किया होगा
अनवर शऊर
'शुऊर' सिर्फ़ इरादे से कुछ नहीं होता
अनवर शऊर
'शुऊर' ख़ुद को ज़हीन आदमी समझते हैं
अनवर शऊर
सामने आ कर वो क्या रहने लगा
अनवर शऊर
सच है उम्र भर किस का कौन साथ देता है
अनवर शऊर
सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं
अनवर शऊर
निज़ाम-ए-ज़र में किसी और काम का क्या हो
अनवर शऊर
मुस्कुराए बग़ैर भी वो होंट
अनवर शऊर
मुस्कुरा कर देख लेते हो मुझे
अनवर शऊर
मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में
अनवर शऊर
मिरी हयात है बस रात के अँधेरे तक
अनवर शऊर
मेरे घर के तमाम दरवाज़े
अनवर शऊर
मरने वाला ख़ुद रूठा था
अनवर शऊर
लोग सदमों से मर नहीं जाते
अनवर शऊर
लगी रहती है अश्कों की झड़ी गर्मी हो सर्दी हो
अनवर शऊर
कोई ज़ंजीर नहीं तार-ए-नज़र से मज़बूत
अनवर शऊर
किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर
अनवर शऊर
किसी ग़रीब को ज़ख़्मी करें कि क़त्ल करें
अनवर शऊर
किस क़दर बद-नामियाँ हैं मेरे साथ
अनवर शऊर
कहाँ है शैख़ को सुध-बुध मज़ीद पीने की
अनवर शऊर
कह तो सकता हूँ मगर मजबूर कर सकता नहीं
अनवर शऊर
कड़ा है दिन बड़ी है रात जब से तुम नहीं आए
अनवर शऊर
कभी रोता था उस को याद कर के
अनवर शऊर
जनाब के रुख़-ए-रौशन की दीद हो जाती
अनवर शऊर
जनाब के रुख़-ए-रौशन की दीद हो जाती
अनवर शऊर
इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह
अनवर शऊर