Couplets Poetry (page 106)
अनल-हक़ की हक़ीक़त को जो हो मंसूर सो जाने
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐसी हवा बही कि है चारों तरफ़ फ़साद
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐसा करूँगा अब के गरेबाँ को तार तार
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐ मुसलमानो बड़ा काफ़िर है वो
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐ ख़िज़ाँ भाग जा चमन से शिताब
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐ ख़िरद-मंदो मुबारक हो तुम्हें फ़र्ज़ानगी
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अहल-ए-म'अनी जुज़ न बूझेगा कोई इस रम्ज़ को
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अगर रोते न हम तो देखते तुम
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अदल से कर सल्तनत ऐ दिल तू तन के मुल्क में
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अदा-ओ-नाज़ ओ करिश्मा जफ़ा-ओ-जौर-ओ-सितम
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अभी मस्जिद-नशीन-ए-तारुम-ए-अफ़्लाक हो जावे
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
आरिज़ से उस के ज़ुल्फ़ में क्यूँ-कर है रौशनी
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
आज हमें और ही नज़र आता है कुछ सोहबत का रंग
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
आई ईद व दिल में नहीं कुछ हवा-ए-ईद
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
आगे क्या तुम सा जहाँ में कोई महबूब न था
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
आब-ए-हयात जा के किसू ने पिया तो क्या
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
आ कर तिरी गली में क़दम-बोसी के लिए
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
कल बज़्म में सब पर निगह-ए-लुतफ़-ओ-करम थी
शैख़ मोहम्मद रोशन जोशिश लखनवी
ज़रा सा ग़म हुआ और रो दिए हम
शहज़ाद अहमद
ज़रा लबों के तबस्सुम से बज़्म गर्माएँ
शहज़ाद अहमद
ज़मीन नाव मिरी बादबाँ मिरे अफ़्लाक
शहज़ाद अहमद
ज़बानें थक चुकीं पत्थर हुए कान
शहज़ाद अहमद
यूँ तो हम अहल-ए-नज़र हैं मगर अंजाम ये है
शहज़ाद अहमद
यूँ तिरी याद में दिन रात मगन रहता हूँ
शहज़ाद अहमद
यूँ तर्क-ए-तअल्लुक़ की क़सम खाए हुए हों
शहज़ाद अहमद
यूँ किस तरह बताऊँ कि क्या मेरे पास है
शहज़ाद अहमद
ये समझ के माना है सच तुम्हारी बातों को
शहज़ाद अहमद
ये चाँद ही तिरी झोली में आ पड़े शायद
शहज़ाद अहमद
ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से
शहज़ाद अहमद
ये और बात इसे ज़िंदगी न कह पाएँ
शहज़ाद अहमद