Rubaai Poetry (page 11)
ममनूअ शजर से लुत्फ़-ए-पैहम लेने
जोश मलीहाबादी
मालूम था तकलीफ़ सिवा गुज़रेगी
रशीद लखनवी
मालूम कि इंसान किसे कहते हैं
नज़ीर बनारसी
मा'लूम का नाम है निशाँ है न असर
इस्माइल मेरठी
मकशूफ़ हुआ कि दीद हैरानी है
इस्माइल मेरठी
मक्र-ओ-रिया
अल्ताफ़ हुसैन हाली
मकानी हूँ कि आज़ाद-ए-मकाँ हूँ
अल्लामा इक़बाल
मज्ज़ूब
जमाल ओवैसी
मजमूआ-ए-ख़ार-ओ-गुल है ज़ेब-ए-गुलज़ार
इस्माइल मेरठी
मैं उस की पुजारन वो पुजारी मेरा
सना गोरखपुरी
मैं सर पे गुनाहों का लिए बार आया
अहमद हुसैन माइल
मैं नफ़्स-परस्ती से सदा ख़्वार रहा
साहिर देहल्वी
मैं मुंकिर-ए-अस्लाफ़ नहीं हूँ यारो
परवेज़ शाहिदी
मैं ख़ाक था आदमी बनाया तू ने
मीर मेहदी मजरूह
मैं कौन यक़ीन-ए-बद-गुमानी हूँ मैं
कालीदास गुप्ता रज़ा
मैं बुग़्ज़ के अम्बार से क्या लाता हूँ
सादिक़ैन
मैं अपने कफ़न का सीने वाला निकला
अहमद हुसैन माइल
मय-ख़्वारों से जब दूर नज़र आएगी
नज़ीर बनारसी
मय-ख़ाने में जाने का ये हंगाम नहीं
बाक़र मेहदी
मय-ख़ान-ए-कौसर का शराबी हूँ मैं
मीर अनीस
महताब में सुर्ख़ अनार जैसे छूटे
फ़िराक़ गोरखपुरी
महबूब ने पैरहन में जब इत्र मला
नज़ीर अकबराबादी
माहौल से ज़ुल्मत की रिदा हटती है
नरेश कुमार शाद
मफ़्लूज हर इस्तिलाह-ईमाँ कर दे
जोश मलीहाबादी
लो जाइए बस ख़ुदा हमारा हाफ़िज़
ग़ुलाम मौला क़लक़
लिल्लाह मिरी सोज़िश-ए-पैहम को न छेड़
नज़ीर बनारसी
लिल्लाह हमारे ग़ुर्फ़ा-ए-दीं को न छोप
जोश मलीहाबादी
लिक्खे हैं फ़क़ीर ने जो शाही अल्फ़ाज़
सादिक़ैन
लिहाफ़
फ़े सीन एजाज़
लेता था जवानी में कभी जिस की पनाह
क़तील शिफ़ाई