Rubaai Poetry (page 23)
घर लौह का आबाद किया है ऐ दोस्त
सादिक़ैन
ग़ैरों को शब-ए-वस्ल बुलाने से ग़रज़
ग़ुलाम मौला क़लक़
ग़ैरत में सियासत में शुजाअ'त में हो मर्द
सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़
ग़फ़लत में न खो उम्र कि पछताएगा
मीर अनीस
ग़फ़लत की हँसी से आह भरना अच्छा
अकबर इलाहाबादी
ग़फ़लत के तुख़्म बोने वाले उठे
अहमद हुसैन माइल
गेसू में वो सुम्बुल के चमन हैं मालूम
सादिक़ैन
गेसू बिखरे हुए घटाएँ बे-ख़ुद
फ़िराक़ गोरखपुरी
गरमी में ग़म-ए-लिबादा ना-ज़ेबा है
अमजद हैदराबादी
गरमी इमसाल किस क़यामत की पड़ी
बयान मेरठी
गर्म हवा
फ़े सीन एजाज़
गर्दन को झुका देता है अदना एहसान
ग़ुलाम मौला क़लक़
गर यार से हर रोज़ मुलाक़ात नहीं
नज़ीर अकबराबादी
गर यार के सामने मैं रोया तो क्या
मोहम्मद रफ़ी सौदा
गर रूह न पाबंद-ए-तअ'य्युन होती
इस्माइल मेरठी
गर नेक दिली से कुछ भलाई की है
इस्माइल मेरठी
गर कहे हुलूल है वो इक अमर क़बीह
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
गर जौर-ओ-जफ़ा करे तो इनआ'म समझ
इस्माइल मेरठी
गर अक़्ल-ओ-शुऊर की रसाई होती
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
गर अपनी सना आम नहीं दुनिया में
सादिक़ैन
गाहे तो करम हम पे भी फ़रमाएँ आप
ग़ुलाम मौला क़लक़
गदाई की तर्ग़ीब
अल्ताफ़ हुसैन हाली
फ़ुर्सत कोई साअत न ज़माने से मिली
मीर अनीस
फ़ितरत के मुताबिक़ अगर इंसाँ ले काम
इस्माइल मेरठी
फ़रमान-ए-अली लौह-ओ-क़लम तक पहुँचा
मिर्ज़ा सलामत अली दबीर
फ़रियाद है किस लिए दर-ए-यज़्दाँ पर
तिलोकचंद महरूम
फ़ानी न कहो होता है कम इस का वक़ार
कालीदास गुप्ता रज़ा
फ़ानी के है नज़दीक बक़ा को भी फ़ना
ग़ुलाम मौला क़लक़
इक वो हैं कि इंकार किए जाते हैं
अमीर चंद बहार
इक टीस कलेजे को मसलती ही रही
अख़्तर अंसारी