Rubaai Poetry (page 19)

इंकार-ए-गुनाह भी किए जाता हूँ

तिलोकचंद महरूम

इंकार न इक़रार न तस्दीक़ न ईजाब

इस्माइल मेरठी

इम्कान-ए-तलब से कोई आगाह तो हो

यगाना चंगेज़ी

ईमाँ का तक़ाज़ा है कि ख़ुद्दार बनो

ओबैदुर् रहमान

इल्ज़ाम लगाया है तो साबित भी करो

अमीर चंद बहार

इल्म ओ हिकमत में हो अगर ख़्वाहिश-ए-फ़ेम

अकबर इलाहाबादी

इख़्लास की धोके पर हूँ माइल तेरा

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

इख़्फ़ा के लिए है इस क़दर जोश-ओ-ख़रोश

इस्माइल मेरठी

इज्तिहाद

जमाल ओवैसी

इफ़्लास में क्यूँ टेक्स लगा रक्खा है

बयान मेरठी

ईद-ए-रमज़ाँ है आज बा-ऐश-ओ-सुरूर

इस्माइल मेरठी

ईद-ए-क़ुर्बां है आज ऐ अहल-ए-हमम

इस्माइल मेरठी

ईद आई है ऐश-ओ-नोश का सामाँ कर

अख़्तर शीरानी

हुशियार है सब से बा-ख़बर है जब तक

मीर अनीस

हम उस की जफ़ा से जी में हो कर दिल-गीर

नज़ीर अकबराबादी

हम साँप पकड़ लेते हैं बीनों के बग़ैर

सादिक़ैन

हम कौन हैं एहतिमाम करने वाले

ग़ुलाम मौला क़लक़

हम दिल से जो चाहते हैं ऐ जान तुम्हें

नज़ीर अकबराबादी

हम दिल का हर इक ज़ख़्म छुपा लेते थे

ओबैदुर् रहमान

हम देख के तुम से रुख़-ए-आराम मियाँ

नज़ीर अकबराबादी

हम भूल को अपनी इल्म-ओ-फ़न समझे हैं

तिलोकचंद महरूम

हम आलम-ए-ख़्वाब में हैं या हम हैं ख़्वाब

इस्माइल मेरठी

हुए बे-ख़ुद तो बे-ख़ुदी आई

पंडित जवाहर नाथ साक़ी

होती नहीं फ़िक्र से कोई अफ़्ज़ाइश

इस्माइल मेरठी

होंटों से लगाता है कोई जाम कहाँ

अमीर चंद बहार

होंटों पे दुआ आई मगर आया न तू

फ़रीद परबती

होंटों को शराब अब पिला दे साक़ी

परवेज़ शाहिदी

हों क्यूँ न बुतों की हम को दिल से चाहें

नज़ीर अकबराबादी

हो जाती है सहल पेश-ए-दाना मुश्किल

मीर अनीस

हो हिन्द का मद्ह-ख़्वाँ बरस में दो बार

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम