Rubaai Poetry (page 28)

बख़्त ने फिर मुझे इस साल खिलाई होली

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बा-ईं हमा-सादगी है पुरकारी भी

इस्माइल मेरठी

बाग़ों पे छा गई है जवानी साक़ी

जोश मलीहाबादी

बदले न सदाक़त का निशाँ एक रहे

शाद अज़ीमाबादी

बदला नहीं कोई भेस नाचारी से

इस्माइल मेरठी

बढ़ता हुआ हौसला न टूटे दिल का

नज़ीर बनारसी

बचपन में तुझे याद किया था मैं ने

सादिक़ैन

बाबुल के घर से जब आई उठ कर डोली

सना गोरखपुरी

बातों में तो इख़्तियार शीरीनी कर

आसी उल्दनी

बालों पे ग़ुबार-ए-शेब ज़ाहिर है अब

मीर अनीस

बादल को लगी खिलते बरसते कुछ देर

यगाना चंगेज़ी

बादल आ के रो गए हाए ग़ज़ब

मीर अनीस

औरों को बताऊँ क्या मैं घातें अपनी

जोश मलीहाबादी

अता अस्लाफ़ का जज़्ब-ए-दरूँ कर

अल्लामा इक़बाल

असरार जहाँ लतीफ़ा-ए-ग़ैबी हैं

बयान मेरठी

असलियत अगर नहीं तो धोका ही सही

अमजद हैदराबादी

अस्लाफ़ का हिस्सा था अगर नाम-ओ-नुमूद

इस्माइल मेरठी

अश्कों में नहाओ तो जिगर ठंडे हों

मीर अनीस

अश्क आए ग़म-ए-शह से जो चश्म-ए-तर में

अहमद हुसैन माइल

असहाब ने पूछा जो नबी को देखा

मीर अनीस

अशआर में ढलता है मिरा सोज़-ए-दरूँ

बाक़र मेहदी

अरमान निकलने का मज़ा है कुछ और

यगाना चंगेज़ी

अरबाब-ए-वफ़ा की जाँ-गुदाज़ी देखी

सूफ़ी तबस्सुम

अर्बाब-ए-क़ुयूद तुझ को क्या देखेंगे

शाद अज़ीमाबादी

अपनी सूरत न जब नज़र आई

पंडित जवाहर नाथ साक़ी

अपनी हद से गुज़र गए अब क्या है

यगाना चंगेज़ी

अपने ही दिल अपनों का दुखाते हैं बहुत

इस्माइल मेरठी

अपने आक़ा की हर घड़ी याद में हूँ

मुनीर शिकोहाबादी

अंजाम पे अपने आह-ओ-ज़ारी कर तू

मीर अनीस

अंदोह-ए-शबाब टालने को ख़म हूँ

रशीद लखनवी