Rubaai Poetry (page 7)

सब कहते हैं मरकज़-ए-बदी है दुनिया

अमजद हैदराबादी

रुत्बा जिसे दुनिया में ख़ुदा देता है

मीर अनीस

रुस्वा वो हुआ जो मस्त पैमाना हुआ

अकबर इलाहाबादी

रुख़्सत अभी ज़ुल्मतों का डेरा कर दूँ

नज़ीर बनारसी

रोता ही रहूँगा मुस्कुराने तो दो

परवेज़ शाहिदी

रोना है बदा जिन्हें वो जम जम रोएँ

यगाना चंगेज़ी

रिंदों में नहीं कोई रक़ाबत साक़ी

परवेज़ शाहिदी

रिंदों को बहिश्त की ख़बर दे साक़ी

अख़्तर शीरानी

रेशा रेशा बिखर गया मैं न कि तू

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

रिफॉर्म की हद

अल्ताफ़ हुसैन हाली

रौशन कभी हो जाएँगे दिन रात मिरे

फ़रीद परबती

रौशन है कि शाद-ए-सुख़न-आरा मैं हूँ

शाद अज़ीमाबादी

रंगीनी-बज़्म-ओ-बू किस की है

तिलोकचंद महरूम

रखती है जो ख़ुश चाह तुम्हारी हम को

नज़ीर अकबराबादी

रखते हैं जो हम चाह तुम्हारी दिल में

नज़ीर अकबराबादी

रखता है अपने हुस्न पर वो दिल रुबा घमंड

क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी

रक्षा-बंधन की सुब्ह रस की पुतली

फ़िराक़ गोरखपुरी

रख याद अभी तेरा सबक़ बाक़ी है

नवाज़ असीमी

रहमत की कड़ी धूप में लेटूँ मौला

सादिक़ैन

रहमत का तेरे उम्मीद-वार आया हूँ

भारतेंदु हरिश्चंद्र

रहमान-ओ-रहीम है वो रब्ब-ए-इबाद

अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद

राही तरफ़-ए-आलम-ए-बाला हूँ मैं

मीर अनीस

रहबान का क़ैस का महबूब है तू

मीर मेहदी मजरूह

रफ़्तार ओ सदा गुम्बद-ए-अफ़्लाक में आए

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

राज़-ए-हस्ती बशर को हो क्या मा'लूम

तिलोकचंद महरूम

क़तरे हैं ये सब जिस के वो दरिया है अली

मीर अनीस

क़तरे अरक़-ए-जिस्म के मोती की लड़ी

फ़िराक़ गोरखपुरी

क़तरा समझे हक़ीक़त-ए-दरिया क्या

तिलोकचंद महरूम

क़ानून नहीं कोई फ़ितरत के सिवा

जोश मलीहाबादी

क़ामत है कि अंगड़ाइयाँ लेती सरगम

फ़िराक़ गोरखपुरी